यूपी में हार कर भी अपने मिशन में एक क़दम आगे बढ़ गए ओवैसी : पढे विशेष रिपोर्ट




दिल्ली: असदुद्दीन ओवैसी का ‘मिशन यूपी’ पूरी तरह से फ्लॉप हो गया. उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (मजलिस) उत्तर प्रदेश चुनाव में कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ सकी. पांच-छः सीटों को छोड़कर आमतौर ओवैसी की पार्टी से खड़े ज़्यादातर उम्मीदवारों के वोटों की संख्या दो-तीन हज़ार से ज़्यादा नहीं रही. अधिकतर अपनी जमानत भी खो बैठे. मगर ओवैसी के विरोधी उन पर मुस्लिम वोटों के बंटवारे का इल्ज़ाम लगा रहे हैं. उन पर भाजपा का एजेन्ट होने का इल्ज़ाम भी लग रहा है. कुछ ऐसा ही इल्ज़ाम उन पर बिहार चुनावों के दरम्यान भी लगा था.

सोशल मीडिया पर ओवैसी के ख़िलाफ़ अभियान तक छेड़ दिया गया है. मगर सवाल है कि जहां बड़े-बड़े दिग्गज नाकाम हो गए, वहां हार का सारा ठिकरा ओवैसी के सर पर ही फोड़ देना कहां से जायज़ है? ओवैसी की पार्टी के अधिकतर उम्मीदवारों को जितने वोट मिले हैं, उनकी संख्या पर ध्यान दें तो उससे हार-जीत पर कोई ख़ास फ़र्क़ पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है. कई उम्मीदवारों को मिले वोट न किसी को जीत दिलाने में सक्षम है और हरा सकने में. आंकड़ों को देखें तो कई इलाकों में मुस्लिम वोटों का बंटना तो दूर, वे एआईएमआईएम के उम्मीदवारों को मिल भी नहीं सके.
मजलिस ने उत्तर प्रदेश की 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इनमें से सिर्फ़ सम्भल विधानसभा सीट पर शफीकुर्रहमान बर्क के पोते ज़ियाउर्रहमान बर्क 60426 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे. यही नहीं, जिन 38 सीटों पर मजलिस ने चुनाव लड़ा, उनमें से 13 सीटों पर सपा और 22 सीटों पर भाजपा की जीत हुई है. लेकिन जब भाजपा द्वारा जीती गयी इन 22 सीटों का आंकलन करते हैं तो पता चलता है कि चार सीटों को छोड़कर किसी भी सीट पर जीत-हार का जितना अंतर रहा उतना वोट तो मजलिस के उम्मीदवार को मिला ही नहीं.
अगर चार सीटों की बात करें तो सबसे पहले मुरादाबाद की कांठ विधानसभा सीट आती है. यहां से जीत-हार 2348 वोटों के अंतर से हुई है. और मजलिस के उम्मीदवार फिजुल्लाह चौधरी को 22908 वोट हासिल हुए हैं. लेकिन यहां ये बात भी ध्यान रखने की है कि इस सीट पर सपा, बसपा और रालोद तीनों ने ही मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे. यही नहीं, पीस पार्टी के उम्मीदवार को भी यहां 13931 वोट हासिल हुए हैं. बाक़ी के तीनों सीटों की भी कहानी इसी प्रकार है.
हक़ीक़त में यूपी चुनाव में ओवैसी को सीटों के मद्देनज़र कोई भी सफलता नहीं मिली है, मगर ओवैसी का ‘मिशन नेशनल पार्टी’ एक क़दम ज़रूर आगे बढ़ गया है. इस चुनाव में ओवैसी की पार्टी को 38 सीटों पर कुल205232 वोट मिलें, जो पूरे यूपी में पड़े वोटों का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत है.

क्र. सं.विधानसभा क्षेत्रमजलिस प्रत्याशीवोटस्थान  विजेता अंतर
1.सहारनपुर नगरतलत खान

693

पांचवां संजय गर्ग (सपा) 4636
2.कैरानामशीउल्लाह

1365

पांचवां नाहिद हसन (सपा) 21162
3.नजीबाबादताज़ीम सिद्दीक़ी

2094

पांचवां तसलीम अहमद (सपा) 2002
4.नगीनानीलम

4385

चौथा मनोज कुमार पारस (सपा) 7967
5.कांठफ़िजाउल्लाह चौधरी

22908

चौथा राजेश कुमार सिंह (भाजपा) 27363
6.ठाकुरद्वाराएजाज अहमद

9444

चौथा नवाब जान (सपा) 13409
7.मुरादाबाद ग्रामीणमो. असलम

3503

पांचवां हाजी इकराम क़ुरैशी (सपा) 28781
8.मुरादाबाद नगरशहाबुद्दीन

947

सातवां रितेश कुमार गुप्ता (भाजपा) 3193
9.कुंदरकीइसरार हुसैन

7025

चौथा मुहम्मद रिज़वान (सपा) 10821
10.सम्भलज़ियाउर रहमान

60426

दूसरा इक़बाल महमूद (सपा) 18822
11.अमरोहाशमीम अहमद

2861

पांचवां महबूब अली (सपा) 15042
12.हसनपुरनौशाद अली

1235

पांचवां महेन्द्र सिंह (भाजपा) 27770
13.आगरा दक्षिणइदरिस

232

सोलहवां योगेन्द्र उपाध्याय (भाजपा) 54225
14.फ़िरोज़ाबादएहतशाम अली (बाबर)

11478

चौथा मनीष असीजा (भाजपा) 41727
15.बदाऊंख़ालिद परवेज़

883

छठां महेश चन्द्र गुप्ता (भाजपा) 16467
16.बिलग्राम-मल्लनवानअब्दुल अज़ीज़

2716

चौथा आशीष कुमार सिंह 8025
17.लखनऊ वेस्टमुहम्मद तौहीद सिद्दीक़ी

1770

चौथा सुरेश कुमार श्रीवास्तव (भाजपा) 13072
18.लखनऊ सेन्ट्रलमुहम्मद इरफ़ान

2314

पांचवां बृजेश पाठक (भाजपा) 5094
19.इसौलीहाजी मो. हाजी दाऊद खान

3865

छठां अबरार अहमद (सपा) 4241
20.आर्या नगररबीउल्लाह

1557

पांचवां अमिताभ भाजपाई (सपा) 5723
21.इलाहाबाद दक्षिणसैय्यद अफ़ज़ल मुजीब

868

पांचवांनंदगोपाल गुप्ता नंदी (भाजपा) 28587
22.बाराबंकीमो. अबुल कलाम कलाम कुरैशी

708

आठवां धर्मेन्द्र सिंह यादव (सपा) 29705
23.बीकापुरजुबैर अहमद

3275

चौथा शोभा सिंह चौहान (भाजपा) 26652
24.टांडाइरफ़ान पठान

2070

चौथा संजू देवी (भाजपा) 1725
25.मटेरामो. अकीउल्लाह

1226

छठां यासर शाह (सपा) 1595
26.कैसरगंजअदनीस जमील

3719

चौथा मुकुट बिहारी (भाजपा) 27363
27.श्रावस्तीकलीम

2933

पांचवां राम फेरान (भाजपा) 445
28.गैनसरीमंज़ूर आलम खान

3160

पांचवां शैलेष कुमार सिंह (भाजपा) 2303
29.उतरौलामो. मिज़ामुल्लाह खान

2966

चौथा राम प्रताप (भाजपा) 29174
30.शोहरतगढ़हाजी अली अहमद

4931

पांचवां अमर सिंह चौधरी (अपना दल) 22124
31.मेंदहदावलमो. ताबिश खान

19040

पांचवां राजेश सिंह बघेल (भाजपा) 42914
32.खलीलाबादतफ़सीरूल्लाह

2578

सातवां दिग्विजय नारायण (भाजपा) 16037
33.फ़रेन्दारीना

1878

छठां बजरंग बहादुर सिंह (भाजपा) 2354
34.नौतनवाकामिनी जयसवाल

1797

सातवां अमनमणि त्रिपाठी (निर्दलीय) 32256
35.कोईलपरवेज़ खान

463

सातवां अनील पाराशर (भाजपा) 50963
36.राम नगरशाहनवाज़

1196

सातवां शरद कुमार अवस्थी (भाजपा) 22727
37.खड्डानिसार अहमद

8903

चौथा जटाशंकर त्रिपाठी (भाजपा) 38497
38.————–

1820

—–  
  कुल वोटों की संख्या:

2,05,232

   

चुनाव आयोग की नियमावली के मुताबिक़ वोटों के लिहाज़ से ज़रूरी शर्तों को पूरा करने के साथ ही ओवैसी की पार्टी एक नेशनल पार्टी में तब्दील हो सकती है. इसी मक़सद से ओवैसी ने बिहार चुनाव भी लड़ा था और इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी. सूत्रों की मानें तो आगे आने वाले कुछ चुनावों में भी ओवैसी की पार्टी इसी एजेंडे को आगे बढ़ाएगी.
स्पष्ट रहे कि चुनाव आयोग के नियम बताते हैं कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेशनल पार्टी बनने के लिए उस पार्टी को लोकसभा या विधानसभा के चुनाव में किन्हीं चार या अधिक राज्यों में डाले गए कुल वैध मतदान का 6 फ़ीसदी वोट हासिल हुआ हो. इसके अलावा किसी एक राज्य अथवा अधिक राज्यों से विधानसभा की कम से कम चार सीटें जीतनी ज़रूरी होती है या लोकसभा में कम से कम दो फीसदी सीटें हों और कम से कम तीन राज्यों में प्राप्त की गई हों.
दरअसल, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (मजलिस) की स्थापना 1927 में ही हो चुकी थी. लेकिन पहली बार 1984 में हैदराबाद लोकसभा सीट से मजलिस चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची. तब से ये सीट मजलिस के कब्ज़े में ही है. इसके अलावा 2014 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में मजलिस को 7 सीटों पर कामयाबी मिली और साथ ही ‘स्टेट पार्टी’ होने का दर्जा भी. इतना ही नहीं, मजलिस को महाराष्ट्र में भी दो सीटों पर कामयाबी मिली. मजलिस ने यहां 24 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. यहां मजलिस को कुल 5.13 लाख वोट मिले, बल्कि 12 सीटों पर मजलिस के उम्मीदवारों ने कड़ी टक्कर भी दी थी. बिहार चुनाव में भी मजलिस को 80248 वोट मिले थे. बिहार में मजलिस ने अपने 6 उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन एक भी सीट इसकी झोली में नहीं आ सकी. लेकिन मजलिस अपने ‘मिशन-2019’ के लिए एक तरह से इन राज्यों में विधानसभा चुनाव के बहाने एक संगठन भी खड़ा कर रही है ताकि लोकसभा चुनाव में भी अपने कुछ चुनिंदा सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर अपने लक्ष्य को पूरा किया जा सके.
ओवैसी यूपी आकर प्रयोग करना करना चाहते थे. और एक हद तक वे अपने प्रयोग में सफल भी हुए हैं. ओवैसी के मिशन की मुख़ालफ़त करने वाले ये बात नज़रंदाज़ कर जा रहे हैं कि वे लगातार अपना दायरा बड़ा कर रहे हैं. हैदराबाद से महाराष्ट्र, महाराष्ट्र से बिहार और बिहार से यूपी. ओवैसी की पार्टी भले ही इन तमाम जगहों पर बहुत अच्छा न कर सकी हो, लेकिन चर्चा में वो ज़बरदस्त तरीक़े से रही है.ओवैसी की पार्टी मजलिस अब दिल्ली में निकाय चुनाव लड़ने की तैयारी में है. मुस्लिम मतदाताओं के भीतर भी ओवैसी की पार्टी को लेकर उत्सुकता अब भी बनी हुई है, जो ओवैसी के राष्ट्रीय पार्टी मिशन के पूरा होने के बाद शायद कोई और बड़ा रूप ले ले.

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