बड़ा साहित्यकार - Hindi Litterateur, Short Story

युवावस्था में तो उसकी कलम रूकती ही नहीं थी। प्रत्येक दिन सामाजिक, राजनैतिक मुद्दों की वह परत-दर-परत व्याख्या कर डालता था, जिसे सराहना के साथ बड़े छोटे अख़बार अपने पृष्ठों पर जगह भी देते थे। जो मुद्दा उसके दिल को छूता था, उस पर जानकारियां जुटाना और अपने विचार उसमें पिरोकर कई सुंदर मालाएं उसने रची... लेकिन, अब उसकी कलम से खुद उसे ही संतुष्टि नहीं मिलती... आखिर क्यों? अंतर्मन की बेचैनी उसकी बढ़ती ही जाती थी, क्योंकि देश में असहिष्णुता बढ़ रही थी तो समाज में साम्प्रदायिक विद्वेष चरम पर था। मुद्दों की गहरी समझ थी उसमें और कलम उसकी डर शब्द से अनजान थी। फिर भी जाने क्यों... ..
उथल पुथल के बीच वह चहलकदमी कर ही रहा था कि उसकी धर्मपत्नी ने कहा सो जाइए, आपको कल साहित्यकारों की बैठक में जाना है।
अ... हं...
मन उचट गया था उसका इन बैठकों/ सम्मेलनों से... वही गुटबाजी, चापलूसी... एक दुसरे की बुराई, पुरस्कारों के लिए लामबंदी!
नींद आँखों से कोशों दूर थी, सोच रहा था वह कि काश! वह बड़ा साहित्यकार नहीं बनता...
कल नहीं जाऊंगा वहां... मन ही मन उसने सोचा!
लेकिन, पद्म पुरस्कारों की रेस में इस बार तो उसका भी नाम है, पंडित जी ने उसकी सिफारिश की है...
मेरी क्रीम वाली नेहरू-जैकेट दे दिया है दरजी ने?... सोये-सोये उसने पत्नी से कहा!
वह गहरी नींद में जा चुकी थी! 
बड़े साहित्यकार की पत्नी होने के बावजूद उसकी पत्नी चैन से सो रही थी, यह देखकर उसके मन ने अपने लिए थोड़ा सुकून ढूंढ ही लिया... !!



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