यह देश है सड़क हादसों का ... Road Accidents in India, Hindi Article




सड़क हादसों के खतरे से भला कौन अनजान होगा? यदि अनुमान से बात करूं तो होश संभालने वाला एक किशोर, हर महीने किसी सड़क हादसे का गवाह बनता है अथवा अपने दोस्त, करीबी के सड़क हादसे में दुर्घटना होने के बारे में सुनता रहता है. 
अख़बार, टेलीविजन की तो बात ही छोड़ दें, अगर आप उसमें प्रत्येक दिन होने वाले हादसों की खबरें पढ़ने लगें तो कह उठेंगे, यह देश है सड़क हादसों का! 
हमारे यहाँ लोग उम्र के सभी पड़ाव को पार करने से पहले वो सारे काम कर लेना चाहते हैं, जो उन्हें महत्वपूर्ण लगते हैं. चूंकि सांसे कब रुक जाएंगी, इसका अंदाजा किसी को है नहीं! उदाहरण के तौर पर अगर हम किसी काम को करने के लिए घर से निकलते हैं, तो कोई गारंटी नहीं कि वह काम हो ही! आप कहेंगे कि यह सोच नकारात्मक है, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते हुए आंकड़ों को देखते हुए ऐसा कहना नकारात्मकता से ज्यादा वास्तविकता है. सड़क पर हर किसी को डर सा लगने लगा है. आखिर ऐसा क्यों है? 

Road Accidents in India, Hindi Article (Pic: Google)
पिछले दिनों हुई घटना की बात करें तो दिल्ली के सागरपुर में एक महिला घर से बस स्टॉप पर बस/ ऑटो के इंतजार में खड़ी थी, लेकिन उसको यह अंदाजा नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला है. बस स्टॉप पर खड़ी वह निर्दोष महिला दो गाड़ियों के बीच आ गई! बस उसका संयोग अच्छा था कि कैसे भी वह जीवित बच गई, किन्तु हर किसी के लिए यह संयोग नहीं होता है. अब ज़रा गौर कीजिये और अपने आस पास नज़रें घुमाइए तो आप ऐसे एक्सीडेंट्स का कारण स्वतः समझ सकते हैं. उस महिला को टक्कर मारने वाली पहली गाड़ी जो सामने से आ रही थी उसे एक नाबालिग चला रहा था, जो गाड़ी की गति पर अपना नियंत्रण खो बैठा और महिला को घसीटे हुए सामने से आने वाली गाड़ी में लड़ गया. 
शहर हो या गाँव आपको हर तरफ नाबालिग तेज गति में गाड़ी चलाते हुए मिल जाएंगे, जिन्हें ठीक से ट्रैफिक नियमों का ही ज्ञान नहीं होता है तो एक्सीडेंट से कितना नुक्सान हो सकता है, इस बात को समझने की उनकी मानसिकता ही नहीं होती है. 
इस स्थिति के लिए आप सरकार को दोष दें या उनके माँ बाप को मगर सच यही है कि पूरा समाज ही इस अपराध में प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार बनता जा रहा है. उपरोक्त मामला केवल अकेला नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश में एटा के अलीगंज में अभी हाल ही में हुए स्कूल बस वाले हादसे को भला कैसे भूला जा सकता है, जिसमें 25 से अधिक बच्चों की मौत हो गयी तो दर्जनों बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए. यह कोई एक्के दुक्के मामले नहीं हैं, बल्कि आंकड़ों को देखें तो भारत में प्रत्येक मिनट एक सड़क हादसे का गवाह होता है. ऐसे ही, हर साल लगभग 5 लाख  लोगों का एक्सीडेंट होता है, जिनमें लगभग डेढ़ लाख लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं. आपको शायद यकीन न हो, किन्तु दुर्भाग्य से रोड एक्सीडेंट्स के मामले में हमारा देश समूचे संसार में पहले नंबर पर कब्ज़ा जमा चुका है.

अगर सड़क हादसों के प्रमुख कारणों पर नजर डालें तो स्थिति विकट नज़र आती है. आंकड़े कहते हैं कि 77 फीसदी सड़क दुर्घटनाएं ड्राईवर्स की गलती की वजह से होती हैं. मतलब साफ़ है कि हमारे यहाँ लोगों को गाड़ी चलाने नहीं आता है और अगर आता भी है तो फिर उन्हें ट्रैफिक नियमों का ज्ञान नहीं होता है. 
ट्रैफिक के नियम तोड़ना तो जैसे हमारा जन्मसिद्ध अधिकार सा बन गया है. चाहे जो भी हो लाल बत्ती के जलने के बाद गाड़ी को तेजी से निकालने में जो मजा नए ड्राइवर्स को आता है, उतना मजा उन्हें शायद किसी और चीज में नहीं आता है. 
ऐसे ही हेलमेट पहनना लोगों को उनकी शान के खिलाफ प्रतीत होता है. वहीं जब एक्सीडेंट हो जाता है तो फिर जीवन भर के लिए अपंगता और कष्ट भोगते हुए लोगबाग पश्चाताप करते नज़र आते हैं. ऐसे ही, 1.5 प्रतिशत दुर्घटनाएं सड़कों में ख़ामी की वजह से होती है. 
इसे दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें कि दुनिया की सबसे खतरनाक सड़कें हमारे यहाँ ही हैं. यह आंकड़ा किसी प्राइवेट एजेंसी का नहीं है, बल्कि सड़क एवं राजमार्ग मंत्रालय का है, जिसने पिछली साल राज्यसभा को यह जानकारी दी थी. गौरतलब है कि 2015 में लगभग 1,46,133 लोग सड़क हादसे में मारे गए, जबकि 2014 में यही आंकड़ा 4.6% कम था. मतलब साफ़ है कि रोड एक्सीडेंट्स में हम दिन ब दिन गिरावट दर्ज करते जा रहे हैं. बेहद शर्मनाक है कि पिछले एक दशक में लगभग 13 लाख लोगों ने सड़क हादसों में अपनी जान गँवा दी है. दिलचस्प है कि पिछले दस साल में सड़क हादसों में होने वाली मौतों में साढ़े 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो किसी भी दूसरी (प्राकृतिक) आपदा में मरने वालो से ज्यादा है. 
हमारे यहाँ का बीमार सिस्टम जो सड़क निर्माण तो करती है, लेकिन उस सड़क के एक बार टूट जाने पर उसकी मरम्मत करना जरूरी नहीं समझती! नतीजा होता है कि सड़कों पर डेढ़ - दो फिट के गढ्ढे हो जाते हैं. 
बरसात के दिनों में तो जैसे सड़कों पर बाढ़ सी आ जाती है और हम आप उस रास्ते से गुजर तक नहीं सकते हैं. स्थिति तब और विकट हो जाती है जब इन्हीं सड़कों पर ओवरलोडेड और हाईस्पीड में गाड़ियां चलती हैं, दुर्घटनाएं होना स्वाभाविक ही है. 

Road Accidents in India, Hindi Article (Pic: Google)
इसी कड़ी में हम अगर यातायात के नियमों के उल्लंघन और सजा की बात करें, तो मोटर यान संशोधन विधेयक 2016 के अनुसार इसके कड़े प्रावधान हैं. मतलब, यदि आप बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चलते हैं या फिर 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति गाड़ी चलाता है, तो इन दोनों ही परिस्थिति में 3 महीने की कैद या रु. 500 जुर्माना या फिर दोनों की सजा भुगतनी होती है. पर सवाल है कि इसे मानता कौन है? लोग जुर्माना देकर बच निकलते हैं और कानून के लंबे हाथ छोटे पड़ जाते हैं. 
ऐसे ही, शराब या नशीले पदार्थों का सेवन करके गाड़ी चलाने पर 10 हजार रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान है. पर हकीकत यह है कि 10 हज़ार जुर्माना देने की बजाय 500 रूपये घूस देकर लोग बच निकलते हैं. 
जाहिर है सड़क दुर्घटनाओं में भ्रष्टाचार की भी अहम् भूमिका है. बात करें हिट एंड रन मामलों की तो इसके लिए दो लाख रूपए का मुआवजा देने की बात है, किन्तु जब सलमान के हिट एंड रन का कुछ नहीं हुआ तो फिर आम आदमी को कहाँ से इन्साफ मिलने वाला है. कानून बहुत हैं यहाँ, किन्तु बड़ा सवाल है कि उन्हें व्यवहार में कौन लाएगा? जैसे, बिना  हेलमेट के वाहन चलाने पर 2,000 रूपये के जुर्माने के साथ तीन महीने के लिए लाइसेंस निलंबित करने का प्रावधान है, पर आप दिल्ली जैसे महानगर में भी, काफी सख्ती के बाद लोगों को बिना हेलमेट और बिना सेट बेल्ट के गाड़ियां चलाते आसानी से देख सकते हैं. इसी कड़ी में अगर बात करें, ड्राइविंग लाइसेंस बनाने की, तो इसके लिए नियम और कानून बेहद मजबूत हैं, लेकिन इसके बाद भी ड्राइविंग लाइसेंस लेना बेहद आसान काम है. 
कहीं भी आप, किसी भी शहर में लाइसेंसिंग अथॉरिटी के बाहर जाकर दलाल से मिल लो, फिर आपका ड्राइविंग लाइसेंस सौ फीसदी बन जायेगा! बेशक आप को गाड़ी के गियर और क्लच की जानकारी न हो! 
नियमतः तो ड्राइविंग टेस्ट और साक्षात्कार देने के बाद ही लाइसेंस इशू किये जाते हैं, लेकिन अनुमान से यह बात कही जा सकती है कि हमारे महान देश भारत में 99 फीसदी लाइसेंस नियम का पालन किये बिना ही इशू होते हैं! 
जब ऐसे ही लाइसेंस वाले सड़क पर गाड़ी चलाते हैं, तो दुर्घटना होने से भला कैसे बचा जा सकता है. किसी ने ठीक ही कहा है, राम भरोसे हिंदुस्तान ... खासकर सड़क हादसों के मामले में तो यह पंक्ति बिलकुल सटीक बैठती है. एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में सालाना डेढ़ करोड़ ड्राइविंग लाइसेंस इशू होता है, जबकि इन्हें जारी करनेवाले कार्यालय की संख्या एक हजार से भी कम है. जाहिर है, यहाँ जिसके पास गाड़ी है, वही ड्राइवर है! कई लोग तो पड़ोसी की गाड़ी पर ही ड्राइविंग लाइसेंस ले लेते हैं तो कई अपने पैदा होने वाले बच्चों के लिए भी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाकर रख लेते हैं. जहाँ तक बात नियमों की है तो जानते सभी हैं, पर मानते कितने हैं? सड़क हादसों के मामले में मुख्य बात यही है और बिना इससे निपटे मामला जस का तस ही रहेगा, इस बात में दो राय नहीं!


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