‘नरभक्षी’ मुसलमान ! ‘आज तक’ ने डेढ़ साल पुरानी झुटी अफ़वाह को ख़बर बना कर परोसा : इस्लामोफ़ोबिया से ग्रस्त मिडिया




क़ामयाब होना कौन नहीं चाहता ? किसे नहीं चाहिए सुखी और सुरक्षित जीवन ? लेकिन शर्त अगर मनुष्य से पिशाच बनना हो तो क्या मंजूर करेंगे…?
अगर आपका जवाब ‘नहीं’ है तो आप बाज़ार से ख़ारिज हो चुके लोगों की लिस्ट में हैं। हक़ीक़त यह है कि अपने फ़ायदे के लिए आदमी को शैतान बनना मंज़ूर है। और ये सामान्य आदमी की बात नहीं, पत्रकारों की बड़ी जमात यह सब करने पर उतारू है। समाज में नफ़रत का ज़हर घोलकर अपना घर और आक़ाओं का कारोबार चमकाने में उसे कुछ ग़लत नहीं लगता !
ताज़ा मामला टीवी टुडे के ‘सबसे तेज़’ चैनल ‘आज तक’ का है। कल यानी 10 अप्रैल को आज तक के फ़ेसबुक पेज पर बार-बार एक ख़बर पोस्ट की गई। ख़बर बता रही थी कि ‘हाल’ ही में सऊदी अरब में एक फ़तवा जारी हुआ है कि भूख लगने पर आदमी अपनी औरत को मार कर खा सकता है।
यह ख़बर अलग-अलग तस्वीर के साथ बार-बार लगाई गई। इस समेत कुल छह अजीब-ओ-ग़रीब फ़तवों की जानकारी दी गई।
हक़ीक़त यह है कि यह ना ‘हाल’ की है और ना ‘ख़बर’ है। ख़बर वह सूचना होती है जो नई हो और जिसमें तथ्य हों। लेकिन यह डेढ़ साल पुरानी एक ‘अफ़वाह’ है जिसका खंडन उसी वक़्त हो गया था। हद तो यह है कि टीवी टुडे की ही वेबसाइट ‘डेली ओ’ में 29 अक्टूबर 2015 में इस फ़र्ज़ीवाड़े की ख़बर छप चुकी थी, फिर भी यह फ़र्ज़ीवाड़ा किया गया। ‘डेली ओ’ने साफ़ लिखा था कि यह ‘फे़क’ फ़तवा है जो वायरल हो रहा है।
सवाल यह है कि डेढ़ साल पहले ही फर्ज़ी साबित हो चुकी एक अफ़वाह को ‘नई ख़बर’ बता कर ‘आज तक’ क्यों चला रहा है ?
यह सीधे-सीधे ‘इस्लामोफ़ोबिया’ को बढ़ाकर अपने पेज के लिए ‘लाइक’ बटोरने के लिए है। चूँकि छोटी-मोटी नफ़रतों के लिए तो हज़ारों व्हाट्सऐप ग्रुप पहले से सक्रिय हैं, इसलि मुसलमानों को ‘नरभक्षी’ बताने की ‘बड़ी मुहिम’ चलाने में जुट गया सबसे तेज़ ‘आज तक’ !
ऐसा करके वह देश को ‘शुद्ध’ करने में जुटे (अ)धर्मध्वजाधारियों को एक नया हथियार भी दे रहा है। अब उन्हें किसी मुसलमान की हत्या के लिए गाय के बहान की ज़रूरत नहीं होगी। अब अपनी पत्नी के साथ जा रहे किसी मुसलमान को यूँ भी मारा जा सकता है, क्योंकि ‘आज तक’ बता रहा है कि भूख लगने पर वह पत्नी को मार कर खा जाएगा। एक ‘संभावित हत्यारे’ की हत्या तो पुण्य का काम ही होगा !
पत्रकारिता के नाम पर नफ़रत के कारोबार पहले भी होते रहे हैं, लेकिन आज तक इसे जिस गहराई (गड्ढे) में ले जा रहा है, उसकी मिसाल इतिहास में नही है।
गिड़गिड़ाने का यहांँ कोई असर होता नही 
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ! (दुष्यंत कुमार)
यह अफ़सोस नहीं, अफ़सोस से कुछ ज़्यादा, बहुत ज़्यादा करने की बात है।
साभार: मीडिया विजिल

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