सिर्फ समुदाय विशेष कि तलाक़ कि ख़बरों को मिडिया तक कौन पहुंचा रहा है..? आईये जानतें हैं




तलाक समाज की तय की हुई उस रस्म का हिस्सा है जिसके द्वारा पति पत्नी एक दूसरे से रिश्ता खत्म कर लेते हैं। तलाक किसी भी धर्म में हो, तीन तलाक बोलकर तलाक दिया जाए या कोर्ट में जाकर तलाक दिया जाए परिणाम तो एक ही होता है कि पति पत्नी में सम्बन्ध सदा के लिए खत्म हो जाते हैं।
आजकल मीडिया में मुस्लिम समुदाय की तीन तलाक की ख़बरें नियमित रूप से आरही हैं इसका मतलब यह नहीं कि समाज के अन्य समुदायों में तलाक होना बंद हो गए हैं।
तलाक की घटनाएं हर समुदाय में हो रही हैं और ज़ाहिर है अल्पसंख्यक जो तादाद में कम हैं उनसे ज़्यादा तलाक के मामले प्रतिदिन बहु संख्यक कहे जाने वाले हिन्दू समाज में होते है लेकिन इसके बावजूद मीडिया का कैमरा सिर्फ मुस्लिमो पर टकटकी लगाए हुए है। इसका असल कारण क्या हो सकता है ?
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इस्लामिक शरीयत को चुनौती देते हुए सुप्रीमकोर्ट में तीन तलाक को ख़त्म करने संबंधी एक मामला दायर किया हुआ है। सरकार का कहना है कि तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है। वही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि शरीयतन एक बार में तीन तलाक बोलकर तलाक नहीं दिया जा सकता बल्कि हर तलाक के बाद एक मुद्द्त मुकर्रर है जिसके दौरान यदि पति पत्नी चाहें तो सुलह कर सकते हैं। मामला अभी सुप्रीमकोर्ट में लंबित है।
मीडिया तक कौन पहुंचा रहा तीन तलाक की ख़बरें :
इस मामले की पड़ताल के लिए हमने कुछ तलाक के मामलो का आंकलन किया जो अभी हाल ही में हुए हैं। शाहिस्ता नामक एक मुस्लिम महिला (बदला हुआ नाम) को उनके पति ने तलाक दिया तो मामला मीडिया तक कैसे पहुंचा जबकि शाहिस्ता एक गाँव की रहने वाली महिला है और मीडिया और सोशल मीडिया का ज्ञान नहीं है। उसको उसके पति ने तलाक दे दिया ये बात आखिर दो राष्ट्रीय अखबारों के बाद टीवी चैनलों तक कैसे पहुंची ?
जब इस मामले को टटोला गया तो शक की सुई आरएसएस द्वारा बनाये राष्ट्रीय मुस्लिम मंच पर जाकर रुक गयी। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय मुस्लिम मंच में शामिल महिलाओं को घर घर जाकर यह खबर पहुंचाने की ज़िम्मेदार दी गयी थी कि यदि बीजेपी सरकार में आयी तो तीन तलाक ख़त्म कर देगी और प्रदेश की सभी मुस्लिम महिलाओं को तलाक का खतरा खत्म हो जाएगा। ये एक मुद्दा था जिसे राष्ट्रीय मुस्लिम मंच से जुडी महिलाओं द्वारा दूसरी मुस्लिम महिलाओं को समझाते देखा गया। इसके अलावा भी कई और मुद्दे थे जो यहाँ लिखना गैर ज़रूरी है। उन पर अगले भाग में चर्चा करेंगे।
राष्ट्रीय मुस्लिम मंच का नेटवर्क धीमे धीमे बड़े शहरो से होता हुआ गाँव देहात तक पहुँच रहा है। इसका इतनी तेजी से फैलने का एक बड़ा कारण मुस्लिमो में आपस में रिश्तेदारी होना भी है। तलाक की ख़बरें राष्ट्रीय मुस्लिम मंच से जुड़े मुस्लिम ही बीजेपी नेताओं तक पहुंचा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार तलाक की कोई ख़बर मिलने के बाद कुछ महिलाएं पीड़ित तलाकशुदा महिला से मिलने जाती हैं और सबूत के तौर पर बातचीत का वीडियो भी बना कर लाती हैं।
चूँकि तलाक पीड़ित महिला तलाक के कारण दुखी और गुस्से में होती है इसलिए स्वाभाविक है कि यदि कोई उसे ये समझाए कि सीएम या पीएम उसे न्याय दिलवाएंगे तो ज़ाहिर है वो उनसे न्याय मांगने और शुक्रिया अदा करने वाले शब्द कहना भी नहीं भूलेगी। सूत्रों के अनुसार पीड़ित महिला को मालूम ही नहीं होता कि आज जो महिलाएं उससे मिलने आयी थीं वो आरएसएस के मुस्लिम मंच की सदस्य हैं और उसका वीडियो बना रही थीं। सूत्रों ने कहा कि कुछ को छोड़कर अधिकांश पीड़ित महिलाओ को तो ये भी नहीं मालूम कि उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
सूत्रों ने कहा कि इसके बाद महिला के तलाक की खबर बनाकर मीडिया के कान में फूंकी जाती है। जो अगले दिन के अख़बार की सुर्खियां बनती है। सूत्रों ने कहा कि पिछले दिनों उत्तराखंड की एक लड़की का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसमे वह यह कहते देखी गयी कि तीन तलाक से बचने के लिए मुस्लिम लड़कियों को हिन्दू बन जाना चाहिए और हिन्दू लड़को से शादी कर लेनी चाहिए। सूत्रों ने कहा कि इस लड़की ने स्वीकार किया है कि उसकी बहिन का तलाक होने के बाद वह गुस्से में थी और उसे ऐसा कहने के लिए दबाव बनाया गया था। हालाँकि उसने डर की वजह से उन नामो का खुलासा करने से इंकार कर दिया जिन्होंने उसपर दबाव डालकर कैमरे के सामने बयान दिलवाया था।
फिलहाल यह तय माना जा रहा है कि तलाक पर मीडिया का जो रवैया है वह न्यूट्रल नहीं है। यदि मीडिया को महिलाओं से सच में सहानुभूति है तो वह सभी समुदायों में प्रतिदिन होने वाले तलाक के सभी मामलो को भी कवर करे। साफ़ है कि तीन तलाक पर मीडिया को ख़बरें मिल नहीं रहीं बल्कि उसे पहुंचाई जा रही हैं।
खासकर पिछले 15 दिनों में तीन तलाक को लेकर मीडिया में जो भी ख़बरें आयी हैं वो उनके स्थानीय रिपोर्टरों की मार्फत आयी हैं। ऐसे में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिमो में तलाक को लेकर छोटी खबरों को बड़ा बना कर दिखाया जा रहा है और तलाक होने के पीछे के कारण को छिपाकर सिर्फ “तीन तलाक बोलकर तलाक दिया” जैसे शीर्षकों से चलाया जा रहा है।
साभार   लोकभारत

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