अधूरी जानकारी लेकर चैनलों की बहसों में न पड़ें मौलाना, इससे इस्लाम की बदनामी होती है: मुफ्ती नोमानी




देवबंद: भारत में मुस्लमानों का पक्ष रखने के लिए हर रोज दर्जनों मौलाना चैनलों पर चलने वाली बहसों में शामिल होते हैं। लेकिन उन में से बहुत कम ऐसे होते जिन्हें कुरआन और हदीस की पूरी जानकारी होती है।
ऐसे में पूरी तरह अपनी बात न रख पाने का नजीजा यह होता है कि इस्लाम को ही अक्सर कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस बात पर दारूल उलूम मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने गंभीरता जताई है।
उन्होंने कहा है कि मुस्लिम मसलों को लेकर उलेमा-ए-कराम के ऐसे बहस में जाने से इस्लाम की छवि खराब होती है। इसके अलावा बहस में ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जिन्हें शरीयत की जानकारी नहीं होती।
उन्होंने कहा कि मौलानाओं को कुरआन और हदीस की सही जानकारी नहीं होने से अनावश्यक विवाद पैदा होता है। उन्होंने टीवी चैनलों को सलाह दी कि किसी को अगर इस्लाम के किसी मसले का हल अगर जानना है तो उन्हें इस्लामिक संस्थाओं से संपर्क करना चाहिए।
तीन तलाक, हलाला, बहु-विवाह समेत दूसरे मसलों पर उन्होंने कहा कि यह मामले मुस्लिम पर्सनल-लॉ से संबंधित हैं। लेकिन इसे आज बहस का केंद्र बना दिया गया है। इससे न सिर्फ इस्लाम की बदनामी हो रही है बल्कि चैनलों पर ऐसे मुस्लिम नुमाइंदों और तथाकथित मुस्लिम ख्वातीन के हुकूक की पैरवी से गलत और आधी-अधूरी जानकारी लोगों के बीच जाती है।
शरीयत का मसला विवादित बनाने पर भी मुफ्ती नोमानी चिंता जताया। उन्होंने कहा कि ऐसी टीवी बहस शरीयत के मसले को विवादित बना रही है और लोगों को भ्रम हो रहा है। उन्होंने मौलानाओं को सलाह दी कि वे चैनलों पर बेकार की विवादित बहसों में वे जाएं और हो सके जितना वो इससे बचें।
इसके साथ-साथ उन्होंने कहा है कि जिन लोगों को वास्तव में किसी मसले के बारे में जानकारी चाहिए वे देश के विभिन्न हिस्सों में मौजीद प्रमाणित मदरसों और दारुल इफ्ता से सवाल करें, जहां से मसले की उन्हें सही जानकरी मिल सकती है।

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