मुज़फ़्फ़रनगर की आठ सगी बहनों का ये दर्द आपको रुला देगा




मुज़फ़्फ़रनगर : मुज़फ़्फ़रनगर का चर्चित मुहल्ला खालापार से सुजुड़ु गांव की ओर जाने वाली सड़क पर एक जगह है रहमतनगर… आमतौर पर लोग यहां रहना नहीं चाहते. वजह यहां की क़ब्रिस्तान व उसके आस-पास फैली गंदगी और उस गंदगी से उठने वाली बदबू है.
लेकिन एक परिवार यहां पिछले 15 साल से रह रहा है. ये परिवार कांधला से आकर यहां बसा था. इस परिवार में 8 लड़कियां और एक लड़का है. इस परिवार के मुखिया सलीम अहमद का आज से तीन दिन पहले इस दुनिया को छोड़कर गुज़र चुके हैं.
दुख की बात यह है कि जब सलीम अहमद की मौत के बाद जब उन्हें दफ़न कर दिया गया तो उसी रात कुछ चोरों ने उनका पूरा घर साफ़ कर दिया. इस घर में सलीम ने अपनी ज़िन्दगी में एक-एक पाई जोड़कर अपनी बेटियों की शादी के लिए सामान इकट्ठा किया था.
तमाम दिक्कतों से जूझ रहे परिवार में अब मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है. एक तो बाप का साया सर से उठ गया और दूसरा जो कमाया था वो चोरी हो गया. इस चोरी ने इनके सदमें को दुगुना कर दिया है.
सलीम की बीवी संजीदा इद्दत में हैं. इसलिए आस मुहम्मद कैफ़, ने इन लड़कियों से बात की और इनका दुःख साझा किया. यह बड़ी बहन हीना 21 साल की है तो सबसे छोटी अदीबा सिर्फ़ 3 साल की है. इनमें से कोई भी कभी स्कूल नहीं गई. ऐसा नहीं है कि इन्होंने कभी चाहा नहीं.
जैसे ही मैं यह पूछता हूं कि आप सब कभी स्कूल क्यों नहीं गई? 16 साल की शबाना आक्रोशित हो जाती है. हमारे पापा को पसंद नहीं था कि लड़कियां स्कूल जाएं. हमने हमेशा चाहा. ज्यादा ज़िद्द करने पर पिटाई भी हो जाती थी. अम्मी चाहती थी कि हम पढ़े, मगर कभी ऐसा हुआ नहीं.
शबाना की सबसे बड़ी बहन हीना की कुछ महीने पहले शादी हुई है. वहां भी ढेरों परेशानी हैं. शबाना को बिफ़रते देखकर हीना बताती है कि ऐसा नहीं है कि हमारे पापा हमें पढ़ाना नहीं चाहते थे, मगर हमारे पास तो रोटी खाने के भी पैसे नहीं थे. इतने बड़ा परिवार जिसमें दो बीमार, घर चलाते या पढ़ाई में पैसा खर्च करते. स्कूल में पैसे देते तो खाते क्या?
दरअसल सलीम अहमद की 3 दिन पहले ही मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है. वो पहले से दिल के मरीज़ थे. एक दूसरी बेटी उज़्मा को भी दिल की बीमारी है. उज़्मा इस समय 18 साल की है. 8 साल की एक और बेटी नबिया की रीढ़ में ख़तरनाक उभार है.
20 साल की हुमा बताती है कि, हमारे घर में ही एक छोटी सी कच्ची भट्टी लगी है, जिसमें हम ‘पापे’ (चाय के साथ खाए जाने वाले बिस्किट) बनाते हैं. 500 रुपए ऱोज कमा लेते थे. अगर मज़दूर रख लेते तो कुछ नहीं बचता. इसलिए हम बहने ही घर पर काम करते थें. पापा तो बीमार रहते थे. ऐसे हम स्कूल चले जाते तो घर का काम कौन करता?
इतना कहते ही हुमा की आंखें डबडबा जाती हैं. लेकिन कुछ देर रूकते हुए अपनी आंखों के आंसू पोछते हुए कहती है, हाँ, मलाल बहुत है. काश! हम पढ़ पाते तो अपने दम पर खड़े हो जाते. अब क्या कर सकते हैं. बाप का साया भी सर से उठ गया.
इतने में पास बैठी खाला राशिदा कहती हैं, क़ुरान तो पढ़ा है. ज्यादा पढ़ लेती तो रिश्ते कहां कर लेते? आसपास ही बैठी कुछ औरतें भी कहती हैं, हाँ! लड़कियों का घर से बाहर जाना और पढ़ना ठीक नहीं. इस पर बुशरा बोल पड़ती है. अब हम क्या करेंगे. कैसे रोटी खाएंगे. क्या करेंगे. क्या अब हम मजदूरी करेंगे या मांग कर खाएंगे. यह बीमार बहने हैं, इनका क्या होगा. हमें पढ़ाया क्यों नहीं… ये सवाल अंदर तक उधेड़ देते है उन्हें भी हमें भी.
हालात देखिए कि जब इन लड़कियों के अब्बा सलीम अहमद का इंतेक़ाल हुआ तो वो अपने भाई के यहां थे. रविवार को यह पूरा परिवार भी वहीं था. क़ब्रिस्तान में दफ़नाकर जब वापस आए तो रात में सब चाचा के घर रुक गए. वहीं इनकी अम्मी इद्दत में बैठ गईं. मौक़ा देखकर ग़रीब की बेटी की शादी का सामान जो इकठ्ठा किया था वो सब चोर ले गए.

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