म्यांमार सेना गांव पर अंधाधुंध गोलियां बरसा रही थी, मैं अपने बच्चों को ले कर जंगल की तरफ भागी- रशीदा की आपबिती




म्यांमार के अल्पसंख्यक मुसलमानों का पलायन जारी है। कुछ हफ्तों पहले शुरू हुई हिंसा में सौ से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान मारे जा चुके हैं। कुछ रिपोर्ट में मारे जाने वाले रोहिंग्या की संख्या 400 तक बतायी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार करीब कई लाख रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश एवं अन्य देशों में पलायन कर चुके हैं। म्यांमार में ताजा हिंसा तब शुरू हुई जब कथित तौर पर रोहिंग्या मुसलानों को हथियारबंद कट्टरपंथी संगठन ने सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया था। रोहिंग्या मुसलमानों का आरोप है कि उसके बाद से ही म्यांमार की सेना रोहिंग्या की “हत्या” कर रही है। कतर की समाचार संस्था अल जज़ीरा ने अपनी एक रिपोर्ट में बांग्लादेश भागकर आयी एक रोहिंग्या पीड़िता से बातचीत की है। 25 वर्षीय राशिदा म्यांमार के सर्वाधिक हिंसा प्रभावित रखाइन प्रांत की रहने वाली हैं। रिपोर्ट के अनुसार राशिदा सितंबर के पहले हफ्ते में ही बांग्लादेश पहुंची।
राशिदा ने अल जज़ीरा को बताया, “…मैं एक बेहद सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन जीती थी। हमारे पास धान के खेत थे जिन पर हम खेती करते थे। मेरे पास घर था, पति था और तीन बच्चे थे। सबकुछ शांतिपूर्ण था जब तक कि हिंसा नहीं शुरू हुई।” राशिदा का परिवार अपना सबकुछ छोड़कर बांग्लादेश पहुंचा है। राशिदा ने कहा, “हमारे खेत और घर जला दिए गए। अब वहां हम जीवन नहीं चला सकते थे।”
राशिदा के अनुसार सेना ने गांववालों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। राशिदा ने बताया, “जब सेना ने हमारे गांव पर अंधाधुंध गोलिया चलानी शुरू की तो मैं अपने बच्चों को लेकर जंगल में भागी और उन्हें छिपा दिया। जंगल में वो काफी डरे हुए थे। जब मैं दोबारा घर गई तो देखा कि कई लोग गोलियों से मारे जा चुके हैं। जंगल के रास्त से होते हुए हम आठ दिन पैदल चलकर सीमा पर पहुंचे। हमें बहुत भूख लगी थी। हमारे पास पेड़ों के पत्ते के अलावा खाने के लिए कुछ नहीं था। बच्चे खाना मांग रहे थे लेकिन हमारे पास कुछ नहीं था।”
राशिदा ने बताया कि उन्होंने एक छोटी सी नाव से सीमा पार की। राशिदा ने कहा, “मुझे बहुत डर लग रहा था। लगता था कि नाव कहीं डूब न जाए इसलिए मैं अपने बच्चो को कस कर पकड़े हुई थी।” बांग्लादेश में एक कैंप में रह रही राशिदा बहुत खुश नहीं हैं। वो कहती हैं, “मुझे अपने घर की याद आती है। यहां हम नाउम्मीद है। पता नहीं हमारा भविष्य क्या होगा?”

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