जनता की सेवा कैसे की जाती है, मोदी जी और योगी जी चाहें तो औरंगज़ेब से प्रेरणा ले सकते हैं




लोकतन्त्र में जनता से कर लिए जाने की व्यवस्था इसलिए है कि शासन अपने तंत्र का इस्तेमाल करके यह पैसा समाज के निचले स्तर के लोगों की भलाई के लिए प्रयोग कर सके, राष्ट्र के हित और सुरक्षित करने में उसका उपयोग कर सके। इस प्रयास में शासन और चुने हुए प्रतिनिधियों का जो भी आवश्यक खर्च हो उसे उचित तरीके से उन पर भी खर्च किया जाए।
राज्य या राष्ट्र के संसाधन का उपयोग राष्ट्र या राज्य की मज़बूती और सुरक्षा के साथ साथ राज्य या राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति की खुशहाली सुरक्षित करने के लिए होती है। शासक यदि इस धन से अपने शौक या अपने निजी धार्मिक कर्तव्य पूरा करता है तो यह अनुचित है अधर्म है। सुना कि योगी जी ने कल अयोध्या में दिपावली मनाने में जनता की गाढ़ी कमाई का ₹124 करोड़ खर्च कर दिए।ताजमहल को दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत कहा जाता है, तमाम आर्टिटेक आजतक उस इमारत में लाख प्रयास के बावजूद एक कमी ना निकाल सके, इसके बावजूद उसे एक शहंशाह की फ़िज़ूलखर्ची आज तक कहा जाता है।
उस शहंशाह ने जनता की गाढ़ी कमाई को अपनी आठवीं बीवी जिनकी मृत्यु शाहजहाँ के 14 वें बच्चे के जन्म के समय हुईं , उनकी मुहब्बत की याद में ताजमहल बनवाया और राज्य के खजाने को उस बीवी के गम में बर्बाद करता रहा जिसका विरोध उसके बेटे “औरंगज़ेब” ने किया और सिंहासन के तख्त से हटा कर लालकीले के एक शानदार हवादार हाल में रहने की व्यवस्था की जहाँ से ताजमहल सबसे स्पष्ट दिखता है , इसे इतिहासकारों ने कैदखाना कहा।
औरंगज़ेब ने अपने पिता की सेवा के लिए अपनी बहन को लगाया जिससे उनकी तिमारदारी होती रहे। खैर , उस समय के औरंगज़ेब के विद्रोह को जनता का समर्थन मिला क्युँकि वह हक पर थे, जनता की कमाई जनता पर ही खर्च होनी चाहिए ना कि शासक के शौक पूरे करने के लिए।
औरंगज़ेब, एक सख्त शासक थे तो शासक को तो सख्त होना ही चाहिए, राष्ट्र अथवा राज्य के कानून का सम्मान तभी हो सकता है। इंदिरा गांधी को देश का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री उनकी सख्ती के कारण ही कहा जाता है, स्वर्णमंदिर में छुपकर गतिविधियाँ चलाते आतंकवादियों पर आपरेशन ब्लूस्टार उनका सख्त और साहसिक निर्णय ही था, ऐसे ही औरंगज़ेब ने भी कुछ मंदिरों तथा कुछ मस्जिदों के विरुद्ध आदेश दिए।
शासक जनता के सामने हर बात के लिए गिड़गिड़ाता नहीं बल्कि सख्त निर्णय लेकर संदेश देता है , औरंगज़ेब भी सख्त निर्णय लेते थे , उनकी प्रजा में हिन्दू भी थे , वह भी अपराध करते थे , मुस्लिम भी दंडित होते थे तो हिन्दुओं को भी दंडित किया जाता था। जिसे आज संप्रदायिक रंग दे दिया गया और औरंगजेब खलनायक बना दिए गये।
राजा या शहंशाह तब न्यायालय का भी काम करता था और उसके दिए फैसलों को यदि कोई क्रूर और निरंकुश कहे तो आज उच्चतम न्यायालय और सरकारें उससे अधिक क्रूर कहीं जाएँगी। खैर, योगी जी खूब धार्मिक कार्य करें उनका स्वागत , यह उनका अधिकार है परन्तु यह वह अपनी टेट से करें अपनी कमाई से करें, जनता के धन को अपनी भक्ती में खर्च करने का उनको नैतिक अधिकार नहीं है।
सीखना चाहें तो वह औरंगज़ेब से सीख सकते हैं।
औरंगज़ेब अपने निजी खर्च के लिए दिल्ली के लालकीले में स्थित मोती मस्जिद में बैठकर अपने हाथों से कुरान लिखते थे और जालीदार टोपियाँ बुनते थे जिसकी “हदिया” से वह अपने घर का खर्च चलाते थे, इस देश में अब तक सबसे अधिक साल 50 वर्ष शासन किए औरंगज़ेब अपने कमरे में दो चिराग रखते थे, शासकीय काम खत्म होता तो पहला चिराग बुझा कर दूसरे चिराग को जलाते और टोपियाँ बुनते, पहले चिराग का तेल सरकारी खज़ाने का और दूसरे चिराग का तेल उनकी अपनी कमाई का होता था।
₹125 करोड़ की दिपावली और ₹30 हजार प्रति किलो की मशरूम और काजू की रोटी खाने वाले लोग औरंगज़ेब से प्रेरणा ले सकते हैं। वह शहंशाह थे और लोकतंत्र में इनको जनता का सेवक कहा गया है। अब सोचिएगा कि दरअसल असली सेवक कौन है ?
मोहम्मद जाहिद (लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं)


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