अगर मुगल बादशाह लुटेरे थे तो मरने के बाद वे दौलत कहां ले गए? राजीव शर्मा का सवाल




हमने कई बार पढ़ा और सुना है कि कोई राजा या बादशाह कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी हुकूमत हमेशा के लिए नहीं होती। जिस सिकंदर के नाम से कभी दुनिया थर्राती थी, आज उसका सिंहासन टूट कर धूल में मिल गया है।
महाराजा अशोक की वह तलवार जो रणभूमि में बिजली की तरह चमकती थी, आज कहां विलीन हो गई, कोई नहीं जानता। कभी मुगल बादशाहों के नाम का डंका पूरी दुनिया में बजता था लेकिन आखिरी शहंशाह बहादुर शाह जफर ने अपने घर से दूर आखिरी सांस ली। वे तो अपने वतन की मिट्टी के लिए भी तरसते रह गए।
इतिहास की कहानी बयान करने वाले ऐसे कई कागज हैं जिनकी स्याही वक्त के साथ मिट गई। कई कागज ऐसे भी हैं जिन पर नई कहानी लिखने के लिए स्याही तैयार हो रही है और उन्हें ज्यादा इंतजार नहीं करना होगा। कल शाम को मैंने एक वेबसाइट पर ऐसे लोगों की कहानियां पढ़ीं जिनके पूर्वज राजा-महाराजा थे लेकिन अब वे बेहद मामूली जिंदगी गुजार रहे हैं। उनमें से एक परिवार का मैं आज जिक्र करना चाहूंगा।
इस परिवार का संबंध मुगल बादशाहों से है। सुल्ताना बेगम नामक ये महिला बहादुर शाह जफर के परपोते की बहू हैं। उनका परिवार जफर की तस्वीर अपने साथ रखता है और उन पर गर्व भी करता है। कहानी यहीं पूरी नहीं होती। सुल्ताना बेगम कलकत्ता के एक बहुत साधारण घर में रहती हैं और उनकी कमाई बहुत ही कम है। इन दिनों वे पेंशन पर गुजारा कर रही हैं।
वेबसाइट पर शाहजहां के शासन काल का भी उल्लेख किया गया है और बैंक आॅफ इंग्लैंड की रिपोर्ट के संदर्भ से बताया गया है कि उस जमाने में हमारे रुपए की ताकत आज के मुकाबले 500 गुना ज्यादा थी। जी हां, यह बात मैं नहीं कह रहा, बैंक आॅफ इंग्लैंड कह रहा है।
आज जब रुपया डालर के मुकाबले गिरने के नए रिकाॅर्ड कायम कर रहा है तो बैंक आॅफ इंग्लैंड की इस रिपोर्ट पर बहुत आश्चर्य होता है। साथ ही 3 सवाल भी आपसे करना चाहूंगा। अगर चाहें तो जवाब दे सकते हैं। अगर न चाहें तो बंदिश नहीं।
1- कहा जाता है कि मुगल बाहर से आए थे, वे लुटेरे थे, उन्होंने हिंदुस्तान को लूटने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। अगर ऐसा था तो उस जमाने में हमारा रुपया इतना मजबूत कैसे हो सकता है? क्योंकि अगर किसी देश में मारकाट, लूट और दहशत का माहौल होता है तो उसकी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, मुद्रा कमजोर हो जाती है और उद्योग-धंधे चौपट हो जाते हैं।
2- अगर मुगल बादशाह बेईमान, डकैत और लुटेरे थे तो उन्होंने भारत का धन जरूर विदेशों में भेजा होगा। यह बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इन दिनों कालेधन को लेकर बहुत मुद्दे उठाए जा रहे हैं। बेईमान और भ्रष्ट आदमी दौलत को सबसे पहले ऐसी जगह भेजता है जहां वह सुरक्षित रहे। वह खुद उसका उपभोग करे और उसके बाद उसकी पीढ़ियां दौलत से गुलछर्रे उड़ाएं।
हमारे कई राजनेताओं पर कालेधन और स्विस बैंकों से संबंध के आरोप लगाए जाते हैं। अगर मुगल बादशाह भ्रष्ट थे तो उन्होंने जरूर उसे कहीं जमा किया होगा। क्या उनका किसी स्विस या विदेशी बैंक में अकाउंट था?
अगर उस जमाने में बैंक जैसी व्यवस्था विकसित नहीं थी तो भी वे ऐसा कोई प्रबंध जरूर कर जाते जिससे उनकी पीढ़ियां ऐश करतीं। अगर उन्होंने ऐसा किया तो मुगल परिवार के ये लोग आज इतने गरीब क्यों हैं? उनके पास तो अरबों की दौलत होनी चाहिए थी। क्या मुगल वो दौलत अपने साथ ले गए, जबकि उनमें से ज्यादातर इसी हिंदुस्तान की मिट्टी में दफनाए गए थे?
3- मुगल बादशाहों के बारे में कहा जाता है कि वे विदेशी लोग थे जिन्हें भारत से कोई प्रेम नहीं था। अगर यह बात मान भी लें कि वे भारत से नफरत करते थे और विदेशी शासक तो आता ही लूटने है, लेकिन अब तो स्वदेशी शासन है। देश में भारतीय मुख्यमंत्री हैं और भारतीय प्रधानमंत्री है। फिर भी भारत के सरकारी दफ्तरों में लूट का सिलसिला बदस्तूर जारी क्यों है?
क्या आज हमारी पुलिस को बाबर हुक्म देता है कि जाओ भैया जाओ, आम लोगों की ठुकाई करो और रिश्वतें खाओ? क्या आज हमारे सरकारी दफ्तरों में बैठे कई कामचोर कर्मचारियों को हुमायूं ने गंगाजी की कसम दे रखी है कि बिना घूस खाए काम मत करना? क्या आज हमारे राजनेताओं को अकबर यह पट्टी पढ़ा रहा है कि दिल को पत्थर से भी ज्यादा कठोर कर लो ताकि आम अवाम की पुकार से भी न पिघल पाए?
क्या जो ढोंगी और बलात्कारी बाबा पकड़े जा रहे हैं, उन्हें जहांगीर ने चरित्रहीनता सिखाई थी? क्या घटिया निर्माण सामग्री से पुल और सड़कें बनाने के लिए शाहजहां लोगों को मजबूर कर रहा है? क्या औरंगजेब हमें कह रहा है कि गरीबों के हिस्से का राशन खा जाओ?
बहुत आसान है मुगल बादशाहों को गालियां देना क्योंकि अब वे दोबारा नहीं आने वाले। बहुत आसान है यह कहना कि ताजमहल को गद्दारों ने बनाया था। बहुत आसान है यह कहना कि इतिहास बदल देंगे। मगर बहुत मुश्किल है वो करना जिससे कि लोगों का वर्तमान सुधर जाए। मुगलों ने जो इमारतें बनाई थीं, वे सदियों से सर्दी, गर्मी, बरसात, धूप, छांव सहन करने के बाद भी शान से खड़ी हैं।
जबकि आज की हुकूमतें (सभी दलों की) जो पुल और सड़कें बनाती हैं, वे उद्घाटन से पहले ही ध्वस्त हो जाती हैं। क्या आपने कभी पढ़ा है कि अकबर ने, शाहजहां ने या औरंगजेब ने फलां इमारत में घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया और उसके पैसे हजम कर गया? ये इमारतें ही कह रही हैं कि वे आज के नेताओं से कहीं ज्यादा ईमानदार थे। अलबत्ता कमियां सभी में होती हैं, मुगलों में भी जरूर रही होंगी। वे कोई फरिश्ते तो नहीं थे।
आज तो नेताओं और बड़े अफसरों की मौत के बाद अखबारों में तीये की बैठक के बड़े विज्ञापन छपते हैं और बड़े-बड़े स्मारक बना दिए जाते हैं। एक बादशाह औरंगजेब था, जिसकी कच्ची कब्र भी खुले आसमान के नीचे है। चाहता तो वो उसे सोने से मढ़वा सकता था। ताजमहल, लाल किला और मुगलिया सल्तनत की इमारतों को कोसना बहुत आसान है। अगर हिम्मत है तो इनसे बेहतर बनाकर दिखाओ। मगर हम जानते हैं, आप ऐसा नहीं कर पाएंगे। इसलिए जो मुगल छोड़ गए, उसी में खुश रहना सीखें। आपसे कुछ नहीं हो पाएगा।
राजीव शर्मा (कोलसिया) (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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