छुआछूत को लेकर दलित ‘सावित्री’ को दबंग ठाकुर ने मारा, मुसलमान ने बचाया!




यह आधुनिक, विश्वगुरु 21वीं सदी के भारत की कहानी है जहाँ आज भी गरीब, दलित, आदिवासियों, किसानों के साथ भेदभाव होता है, प्रान्त, भाषा, जाति, धर्म, वर्ग के नाम पर लोगों के साथ अत्याचार किया जाता है, खानपान, पहचान, बोली, कपड़ों को देख कर लोग तै करते हैं कि किस का क्या किया जाये| राजनीती और धर्म के गठबंधन ने समाज को ताक़तवर बनाने की जगह कमज़ोर किया है|

ये कहानी सावित्री की पड़ोसी परवीन ख़ातून बता रही हैं. बुलंदशहर ज़िले के खेतलपुर भासोली गांव की सावित्री पर 15 अक्टूबर को ठाकुर जाति की एक महिला ने हमला किया था और इस पिटाई के कारण ही सावित्री की 21 अक्टूबर को मौत हो गई थी.
भासोली गांव में इन दिनों अजीब सा सन्नाटा है.
परवीन के साथ ही चारपाई पर बैठी क्रांति देवी कहती हैं, “मोहम्मडन तो हमारे अपने हैं. ये सब हमारी साइड लेते हैं. जाटव भी बेचारे बहुत अच्छे हैं. जो ठाकुर हैं, वो ज़्यादा दबंगई करते हैं. ठाकुर हमें बिल्कुल बेकार समझते हैं. अब भी हमें अछूत समझते हैं.”
सावित्री के पति दिलीप कुमार ने भी कहा कि सावित्री को ‘उस दिन’ मुसलमानों ने ही बचाया था.
जब ये घटना हुई तो सावित्री की सात साल की बेटी उनके साथ थी. वो बताती हैं कि उनकी मां को कैसे डंडों और लातों से मारा गया.
30 साल की सावित्री गर्भवती थीं. वो गांव के ही एक मुस्लिम परिवार के घर में काम करने जाती थीं. 15 अक्टूबर को भी वो मुफिज़ा के घर से काम निपटाकर निकल रही थीं.

छुआछूत का मामला?
आरोप है कि गली में अंजू नाम की ठाकुर जाति की एक महिला से उनका बर्तन छू गया. उस दौरान अंजू का बेटा राहुल भी साथ में था.
आरोप है कि महज छू जाने के कारण दोनों ने सावित्री की पिटाई कर दी. सावित्री को गंभीर चोट लगी थी और 21 अक्टूबर को अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह सिर में गंभीर चोटें बताई गईं. 15 से 21 अक्टूबर तक दिलीप कुमार ने अपनी पत्नी सावित्री की जान बचाने के लिए अस्पताल और थाने तक ख़ूब दौड़भाग की, लेकिन कहीं सहारा नहीं मिला. घटना के पांच दिन बाद एफ़आईआर दर्ज हुई.
पास की ठंडी प्याऊ पुलिस चौकी के प्रभारी अखिलेश पाठक से जब पूछा गया कि 15 अक्टूबर को शिकायत आने के बाद भी एफ़आईआर क्यों नहीं दर्ज की गई तो उनका जवाब था, “दिलीप को कुछ लिखना नहीं आता था, इसलिए ऐसा हुआ.”

एफ़आईआर दर्ज होने में पांच दिन की देरी की बात ना बुलंदशहर देहात के एसपी पीके तिवारी ने मानी और न ही सिटी एसपी प्रवीण रंजन सिंह ने. प्रशासन इस बात को मानने के लिए ही तैयार नहीं है कि इस मामले में किसी तरह की लापरवाही हुई है.
दिलीप का कहना है कि वो ठंडी प्याऊ पुलिस चौकी गए तो अखिलेश पाठक ने उन्हें लौटा दिया और कहा कि शाम को देखते हैं. इसके बाद उन्होंने 100 नंबर पर फ़ोन किया तो पुलिस आई और कोतवाली देहात थाना जाने को कहा.

दिलीप ने कहा कि उन्होंने सावित्री को ज़िला अस्पताल में भर्ती करने का इंतज़ाम कराने के लिए भी थाने में गुज़ारिश की थी, लेकिन किसी ने नहीं सुना. इस दौरान दिलीप पैसे के अभाव में सावित्री का इलाज गांव के ही डॉक्टर से कराते रहे.

हॉस्पिटल ने की अनदेखी
सावित्री की हालत ज़्यादा बिगड़ी तो वो 21 अक्टूबर को उन्हें बुलंदशहर ज़िला अस्पताल लेकर गए. दिलीप और वाल्मीकि समुदाय के लोगों का कहना है कि सावित्री को बेड नहीं दिया गया और बाहर स्ट्रेचर पर रखा गया.
दिलीप का कहना है कि डॉक्टरों ने हाथ तक नहीं लगाया और जांच के नाम पर केवल ख़ून की जांच कराई गई और इसी दौरान सावित्री ने दम तोड़ दिया.
पुलिस चौकी प्रभारी अखिलेश पाठक का कहना है कि उन्होंने कोई कोताही नहीं बरती और कई बार गांव गए थे. उनका कहना है कि मेडिकल जांच में चोट ज़्यादा गंभीर नहीं आई थी, इसलिए भर्ती नहीं कराया गया.

जब लापरवाही की बात बुलंदशहर देहात एसपी पीके तिवारी से पूछी गई तो उन्होंने कहा, “दोनों ही अभियुक्तों को अभी आधे घंटे पहले जेल भेजा गया है. जल्दी ही इस मामले में चार्जशीट पेश की जाएगी.”
”इन पर एससी एसटी एक्ट, आईपीसी की धारा 304 और दूसरी धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं. जैसे ही संज्ञान में मामला आया महिला का मेडिकल चेकअप कराया गया.”

मुसलमानों ने दिया साथ
खेतलपुर भासोली गांव में कई जातियां हैं. यहां मुसलमान, जाटव, वाल्मीकि और ठाकुर मुख्य रूप से हैं. वाल्मीकियों का कहना है कि ठाकुर को छोड़ सभी के साथ उनके अच्छे सबंध हैं.
इनका आरोप है कि ठाकुर अब भी उन्हें अछूत समझते हैं. जिस ठाकुर महिला अंजू पर सावित्री को मारने का आरोप है, उनका घर उसी मुस्लिम परिवार के घर के सामने है, जहां सावित्री काम करने जाती थीं.
आसपास के ठाकुरों के घर भी दलितों और मुस्लिमों से बहुत अलग नहीं हैं. अंजू के घर के सामने ठाकुर जाति के ही वीरपाल सिंह से मुलाक़ात हुई. वीरपाल सिंह गांव से बाहर सड़क पर एक कमरे में रहते हैं.

ठाकुरों की बड़ी हैसियत नहीं
उन्होंने कहा, “यहां किसी की ज़मींदारी नहीं है. अंजू के पास मुश्किल से चार बीघा खेत हैं. उसने बदमाशी की है तो सज़ा मिलनी चाहिए. वो केवल वाल्मीकियों से ही नहीं बल्कि सबसे ऐसा करती है.”
वीरपाल सिंह के अलावा ठाकुर जाति से राहुल नाम का युवक किसी तरह बात करने को तैयार हुआ. राहुल ने माना कि गांव वालों के बीच छुआछूत बड़े पैमाने पर है. उन्होंने कहा कि वो वाल्मीकि के साथ बैठकर खाना नहीं खा सकते.
राहुल ने कहा, “जो नियम बड़े-बुज़ुर्गों ने बनाए हैं, उसे कैसे भूल जाएंगे.”

गांव में ही रहने वाली मुफिज़ा ने कहा कि वो काम के बदले सावित्री को हर महीने 100 रुपए और रात का खाना देती थीं. सावित्री ऐसे ही कई घरों में काम करती थीं.
सावित्री के घर में टीन का एक बक्सा, दो चारपाई, लक्ष्मी और गणेश की दो मूर्तियां और कुछ कैलेंडर ही देखने को मिले.
आंगन में कालिख़ से सना मिट्टी का एक चूल्हा है और उसमें पड़ी राख ठंडी हो चुकी है. ऐसा लग रहा है कि पिछले कुछ दिनों से घर में खाना नहीं बना है.
दिलीप ने जाते वक़्त कहा, “सर, हमारी मदद कीजिएगा…”

रजनीश कुमार बीबीसी संवाददाता, 



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