हादिया का इस्लाम पर डटे रहना ही हादिया की सबसे बड़ी जीत है- पढें हादिया से कोर्ट में पुछे गये सवाल-जवाब




हादिया के ईमान को सलाम

जिसने दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया कि ईमान और मौहब्बत की ताकत क्या होती है।
पूरा सरकारी तंत्र, पुलिस, सांप्रदायिक ताकतें और घर वाले एक तरफ और हादिया का ईमान एक तरफ मगर कोई भी उसके ईमान को डिगा नहीं सका ।

हाई कोर्ट ने उसकी शादी को गैर कानूनी करार दे दिया और शादी के एक महीने बाद शौहर से अलग कर दिया मगर मजबूत ईरादों वाली हादिया ने सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी और अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल करने और शादी करने के फैसले पर डटी रही।
आखिरकार उसे माननीय सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ मिला ।
हादिया ने औरत और मौहब्बत की इज्जत बढ़ाने के साथ साथ हमें ईमान का दरस भी दिया है, हादिया से हमें सीखने की जरूरत है कि हम अपने ईमान को इतना पुख्ता करलें कि कोई भी तूफान हमारे ईमान को डिगा ना सके ।
25 साल की अखिला अशोकन, इस्लाम कुबूल कर अब हादिया है और आज घर, समाज और कानून से लड़ रही है।
हादिया की इस्लाम की तरफ रग़बत उसके साथ पढ़ने वाली दो दोस्त फ़सी अच्छे अख्लाक़ और इबादत/नमाज़ की पाबंदी को देख, अखिला अशोकन को इस्लाम जानने-समझने की ख्वाइश हुई, किताबें पढ़ी, बयानात सुने और आखिर में इस्लाम मजहब को हक़ समझकर अपनाया। अपनी मर्ज़ी से अखिला से हादिया बनी।

खामोशी से इस्लाम पर अमल करने लगी फिर कुछ महीनो बाद, घर वालों को खबर हुई तो उनकी नाराजगी और अज़ीयते झेली फिर भी ईमान पर कायम रही, हिजरत की और अपनी दोस्तों फ़सीना और जसीना से मदद ली। बाद में एक दीनी इदारे में हादिया का दाखिला होता है, और आगे चलकर शाफ़िन नाम के शक्स से निकाह करती है। जब घर वालों को निकाह की खबर होती है तो कानून की मदद से उसे घर में क़ैद कर दिया जाता है, काफी वक़्त अकेले रहते हुए भी, हादिया इस्लाम पर कायम रहती है

आप सोचिए क्या अजर होगा उन बहनों (फ़सीना और जसीना) का, जिनके किरदार को देख एक लड़की इस्लाम की तरफ आती है पर क्या हमारे अख़लाक़ ऐसे है जिन्हे देख लोग इस्लाम से नफरत नहीं बल्कि मोहब्बत रखे, अफसोस आज हमारे अंदर इतना डर है की हमें लोगो को इस्लाम की बात करने और एक रब के बारे में बताने पर भी खौफ करते है।
हिम्मत तो हादिया में है, जो असल कुर्बानी देते हुए दीन का हक़ अदा कर रही है, कई सालो से, हादिया और उसका शोहर शफ़ीन, हमले और इलज़ामत झेल रहे है, कभी लव जिहाद या आतंकवाद के नाम पर तो कभी कहा गया कि लड़की का दिमाग काबू में नहीं, पर जो जवाब हादिया ने हाल में सूप्रीम कोर्ट में दिये, उसे सुन आप भी इसके काबिल ज़हन कि तारीफ करेंगे।
जब अदालत ने हादिया से उसके ख्वाब जानने चाहे तो उसका कहना था कि में आज़ादी से अपने दीन-इस्लाम पर अमल करते हुए शोहर के साथ रहना चाहती हूँ। जब अदालत ने कहा कि सरकार उसकी मदद करेगी पढ़ाई का खर्च उठाने में, तब हादिया का जवाब था कि मुझे सरकार से कोई मदद दरकार नहीं, मेरा शोहर जिन्दा है और वह ही मेरा खर्च उठाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट के सवाल और हादिया का जवाब:
कोर्ट- आप डॉक्टरेट हैं, किस विषषय में?
हादिया- अनुवादक चाहिए। (एक वरिष्ठ वकील ने अनुवादक की भूमिका निभाई)
कोर्ट- किस स्कूल में पढ़ाई की?
हादिया- दसवीं-बारहवीं करने के बाद तमिलनाडु के सेलम से बीएचएमएस किया।
कोर्ट- होम्योपैथी कोर्स। कितने समय तक सेलम में रहीं?
हादिया- पांच साल।
कोर्ट- हॉस्टल में…?
हादिया- किराए पर घर लेकर छह सहेलियों के साथ रही।
कोर्ट- तुम्हें होम्योपैथी पसंद है?
हादिया- हां कोर्स पूरा किया, लेकिन इंटर्नशिप बीच में छूट गई।
कोर्ट- वैकोम (केरल में जहां घर है) से सेलम कितनी दूर है और कितनी बार जाती थीं?
हादिया- लगभग छह-सात घंटे की दूरी है। हर हफ्ते कभी-कभी महीने में जाती थी।
कोर्ट- सेलम में फ्री टाइम में क्या करती थीं?
हादिया- सहेली के लैपटॉप पर फिल्म देखती थी।
कोर्ट- कॉलेज में वाईफाई था?
हादिया- नहीं डाउनलोड करके पेन ड्राइव में देखती थी।
कोर्ट- खाना कौन बनाता था?
हादिया- मैं खुद बनाती थी।
कोर्ट- भविष्य के लिए कोई सपना है तुम्हारा?
हादिया- मुझे आजादी चाहिए।
कोर्ट- बड़ी हो गई हो। माता-पिता हमेशा देखभाल नहीं कर सकते। ऐसे में तुम्हारे अंदर अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता होनी चाहिए।
हादिया- अपनी इंटर्नशिप पूरी करना चाहती हूं। अपनी आस्था धर्म का पालन करना चाहती हूं।
कोर्ट- हम सब भी आस्था रखते हैं, लेकिन जीवनयापन इससे अलग है।
हादिया- अच्छे नागरिक की तरह रहना चाहती हूं। लेकिन अपनी आस्था का भी पालन करना चाहती हूं।
कोर्ट- अच्छी बात है कि तुम अच्छी नागरिक बनने की बात जानती हो?
हादिया- मेरे माता-पिता पुरानी आस्था में वापस लौटाना चाहते हैं।
कोर्ट- सरकार के खर्चे पर इंटर्नशिप करोगी?
हादिया- इसकी क्या जरूरत है। मेरे पति मेरा खर्च उठाने को तैयार है।
कोर्ट- कॉलेज हॉस्टल में रहकर इंटर्नशिप करोगी?
हादिया- सबसे पहले मेरे साथ मानवीय व्यवहार किया जाए।
कोर्ट- इंटर्नशिप करना चाहती हो?
हादिया- हां, लेकिन पहले पति के साथ जाना चाहती हूं। 11 महीने से कस्टडी में हूं। पहले पांच महीने हाई कोर्ट की कस्टडी में और फिर छह महीने से पिता की कस्टडी में।
कोर्ट- हॉस्टल कस्टडी नहीं है। हम चाहते हैं कि तुम अपने पैरों पर खड़ी होने लायक बनो।
हादिया- तमिलनाडु में रहने पर अभिभावक की जरूरत होगी, जिसे मैं अपनी बात बता सकूं। क्या पति को अभिभावक के तौर पर रख सकती हूं?
कोर्ट- पति हॉस्टल में नहीं रह सकता। कॉलेज डीन को अभिभावक बना दें या किसी और को?
हादिया- मुझे कोई और नहीं चाहिए। मेरा पति मेरा अभिभावक है।
आज जरूरत है कि हम इस्लाम को सबसे पहले खुद समझे और इसकी तालीमात दूसरों में आम करे।
लोगो को अल्लाह के बारे में बताए जो एक अकेला है ,उन्हे शिर्क करने से बचाए, उन्हे तमाम भेजे हुए पैगम्बरो की दावत से अवगत कराये, उन्हें रब के भेजे आखिरी ईश्वरीय ग्रन्थ-क़ुरान बताये, उन्हें बताये की क्यों इस्लाम मज़हब आज इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी सबसे तेज़ी से फैलने वाला मज़हब है, वजह है कि लोग सुना-सुनी नहीं बल्कि खुद समझकर और पढ़कर, इस मज़हब को अपना रहे है।
याद रखिए कि रब को हमारी जरूरत नहीं, हमे रब की जरूरत है, अल्लाह तो अपने काम लेगा, हम नहीं करेंगे तो हादिया जैसे आएंगे।

By-ज़ेया उस शम्स





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