गौआतंकियों द्वारा मारे गये उमर ख़ान की मां का दर्द, मेरा बुढ़ापा का सहारा छीन लिया गया।




देश में गाय के नाम पर इंसानों की जान लेने का जो सिलसिला शुरु हुआ था, वह थमने का नाम नही ले रहा है। सबसे पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा के दादरी में अखलाक की हत्या हुई थी, यह हत्या किसी और ने नहीं बल्कि अखलाक के गांव के ही कुछ लोगों ने की थी। अखलाक का बेटा सरताज भारतीय वायू सेना में देश की रक्षा कर रहा था, लेकिन वह गौआतंकियों से अपने पिता की जान नहीं बचा पाया, और गांव के ही लोग जो कुछ समय पहल तक इंसान थे फिर  वे गौआतंकी बन गये और उन्होंने सरताज के पिता अखलाक की सिर्फ इसिलिये हत्या कर दी क्योंकि उन्हें सूचना मिली थी कि अखलाक के फ्रिज में गौमांस है।
अखलाक की हत्या इसलिये भी शर्मशार करती है क्योंकि मंदिर से एलान करके भीड़ इकट्ठा की गई थी कि अखलाक ने गौवध किया है लिहाजा उसको सबक सिखाया जाये, इसके बाद जो हुआ वह बेहद डरावना था, अखलाक को तो बेरहमी से कत्ल किया ही गया उसके बेटे को बुरी तरह पीटा गया, इनता नहीं अखलाक की बूढी मां के मुंह पर गौआतंकियों द्वारा हमला किया गया। दरअस्ल यह उस हिन्दोस्तान की सबसे भयानक तस्वीर थी जिसे 21 वीं सदी में प्रधानमंत्री भारत की सदी बनाना चाहते हैं।
उसके बाद तो ऐसी घटनों का ऐसा सिलसिला जारी हुआ जो रुक ही नहीं रहा, कश्मीर, झारखंड, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर ये वे राज्य हैं जहां पर के नाम पर गौआतंकियों द्वारा इंसानों की हत्या की गई हैं। इस तरह की हत्याएँ बता रही हैं कि 21 वीं सदी का भारत का युवा कितनी क्रूर और निर्दयी हो रहा जो एक जानवर के लिये इंसान की हत्या तक कर डालता है।
हाल ही में राजस्थान के अलवर में 11 नवंबर को उमर खान नाम के एक शख्स की हत्या कर दी गई थी, इस हत्या का आरोप भी गौआतंकियों पर लगाया गया है, इसी अलवर में सात महीना पहले पहलू खान की हत्या कर दी गई थी, पहलू खान की बूढ़ी मां और उमर खान की बूढ़ी मां चंद्रवी की दास्तां अब एक जैसी है, दोनों पीड़ित हैं, और पीड़ित भी ऐसी कि जिन्होंने बुढ़ापे में बेटा की लाश देखी है।
गौआतंकियों द्वारा गये उमर की उम्र 42 साल थी, और वह दिहाड़ी मजदूर थे, उमर के आठ बच्चे हैं जिसमें से दो लड़कियां हैं, बड़े लड़के की उम्र 18 साल है। उनके घर पर सिर्फ बकरियां ही थीं इसलिये बडा परिवार होने की वजह बकरियों के दूध से गुजारा नही पाता था, चूंकि उमर के पास खेती की जमीन भी पर्याप्त मात्रा में न होकर सिर्फ डेढ़ बीघा ही है इसलिये उमर के पास मजदूरी ही सिर्फ एक रास्त थी। उमर घर की जिम्मेदारी, और बच्चों को दूध के लिये गाय लेकर आ रहे थे कि उन्हें रास्ते में कथित तौर पर कत्ल कर दिया गया।
उमर की मां चंद्रवी का रो रोकर बुरा हाल है, उनकी बूढ़ी आंखों के आंसू तो सूख गये हैं, लेकिन उनकी तकलीफ का अंदाजा उनकी बूढी आंखों में झांककर लगाया जा सकता है। बुढ़ापा ज्यादा होने की वजह वे उन्हें बोलने में भी परेशानी होती है, वे बार बार एक ही बात कहती हैं कि उनसे बुढ़ापे का सहरा छीन लिया गया। उधर पुलिस इस मामले को यह कहकर शान्त करने में लगी है कि उमर गौतस्कर था। सवाल यहीं से पैदा होता है कि क्या ये हत्याएं पुलिस और सरकार के सरकार के इशारे पर की जा रही हैं। एक पल के लिये अगर ये मान भी लिया जाये कि उमर गौतस्कर था तो भी क्या किसी भी नागरिक को यह अधिकार है कि वह गौआतंकी बन जाये और इंसान की जान लेले ? फिलहाल उमर की मां इंसाफ चाहती है, वह अपने बेटे के कातिलों को खुद के जिंदा रहते सजा दिलाना चाहती है।
वसीम अकरम त्यागी (लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं)


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