ईरान में भारी विरोध प्रदर्शन, दो की मौत- क्या ईराक, मिस्त्र, लीबिया, सीरिया के बाद अब ईरान की बारी है ?




ईराक, मिस्त्र, लीबिया, सीरिया के बाद अब ईरान की बारी आई है। ईरान में लोग सड़कों पर हैं और सरकार के खिलाफ बढ़ती महंगाई को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। पश्चिमी मीडिया मान रहा है कि इस ईरान में हुई इस उथल पुथल के लिये सुन्नी चरमपंथ और सऊदी अरब की शय प्राप्त है। इन प्रदर्शनों में अब तक दो लोगों की मौत हुई है। बीबीसी बता रहा है कि ईरान की जनता ‘मौलाना शासन’ के खिलाफ है। बड़ा अजीब लगता है जनता अगर मौलाना शासन के खिलाफ है तो फिर महंगाई बढ़ने का नाम क्यों दिया जा रहा है ? क्या मौलाना विद्वान नहीं होता है ? मौलाना क्या अनपढ़ होता है ? ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर हसन रूहानी हैं, इस जुमले को दोबारा पढ़िये कि ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर हसन रूहानी हैं, डॉक्टर! ये डॉक्टर कौन होते हैं ? अगर जनता मौलाना के खिलाफ है तो फिर राष्ट्रपति तो डॉक्टर हैं। दरअस्ल पश्चिमी मीडिया एक तीर से कई निशाने साधना चाहता है। मीडिया नहीं चाहता कि किसी भी इस्लामिक देश में होने वाली उथल पुथल के लिये पश्चिमी देशों पर कोई इलजाम आये, मीडिया यह दिखाना चाह रहा है कि इस्लामिक देशों की जनता नहीं चाहती कि कोई मौलवी सत्ता चलाये। जब ईरान में प्रदर्शन गरीबी के खिलाफ है तो फिर ‘मौलाना शासन’ को हटाने की बात क्यों की जा रही है ? आखिर इस भीड़ का नेतृत्व करने वाला कौन है ? कोई भी तो नहीं, फिर इसका रिमोट किसके हाथ में है ? यहां तो मिस्त्र की असमा महफूज जैसा भी कोई शख्स नही है जिसने मिस्र की जनता से तहरीर चौक पर आने की अपील की थी। फिर ईरान में हो रहे इस प्रदर्शन का नेता क्यों नहीं नजर आता ?

रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि ईरान में बीते दो साल में 15 प्रतिशत लोग गरीब हुऐ हैं, ऐसा ही जस्मिन क्रान्ति के दौरान कहा गया था कि हुस्नी मुबारक ने मिस्त्र की जनता को तबाह कर दिया, लोग गरीब हो गये, बेरोजगारी बढ़ गई, नतीजा क्या हुआ, हुस्नी मुबारक का तख्ता पलट हुआ और फिर उसके बाद से मिस्त्र शान्त नहीं हो पाया। उसके बाद लीबिया जिसकी जनता ने खुद अपने ही राष्ट्रपति को कुचल कर मार डाला। ये सारे वे देश हैं जिन्होंने अमेरिका के दरबार में सज्दा नहीं किया था, एक एक कर सब निपटाये जा रहे हैं। तुर्की में रजब तैय्यब एर्दोगान तो मौलाना नहीं हैं फिर उनके खिलाफ बगावत क्यों हुई थी ? हाल ही में बैतुल मुकद्दस मामले को लेकर संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका और इजरायल की जो फजीहत हुई है उसकी कीमत किसी न किसी तो चुकानी ही पड़ेगी।


वसीम अकरम त्यागी (वरिष्ठ पत्रकार)




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