वो तीन कारण जिस वजह से बहुसंख्यक समाज को मुसलमानों का डर दिखाया जाता है, और वे डर जाते हैं।




एक सवाल चारों तरफ़ से उठ रहा है कि आख़िर मुसलमानों के लिए बहुसंख्यको के दिल मे इतनी नफ़रत कैसे पैदा हो गयी, आखिर ये नफ़रत क्यों पैदा की गयी ? ज़ाहिर है सत्ता हथियाने के लिए, कैसे पैदा की जाती है ? यह जानिये
1 – क़ुरान शरीफ़ से वो आयतें जिनमे दुश्मनों से जिहाद करने का हुक्म है, उनके आधे अधूरे और ग़लत मतलब हिन्दुओ को बताये गये और समझाया गया देखो इनकी क़ुरान मे ही हमसे जंग करने के लिए कहा गया है, अब वो हिन्दू भाई जो यह भी नही जानते कि क़ुरान की भाषा अरबी है या उर्दू, बस हिन्दी मे छपी इन आधी अधूरी बातों को सच मान कर बैठ गये, न तो उन्होने किसी मुस्लिम विद्वान से सम्पर्क किया न पूरा क़ुरान पढ़ कर उसे समझने की कोशिश की, बस उस अधूरी और ग़लत जानकारी को सच मान कर मुसलमानों की तरफ़ से ग़लत धारणा मन मे बिठा ली।
2- पूरी दुनिया मे जहां कहीं भी कोई ऐसी लड़ाई थी जिसमे दोनो पक्ष या एक पक्ष मुसलमान था, उसे इस्लाम की जंग बताकर इस्लाम का जंगी चरित्र बहुसंख्यको के सामने पेश किया गया, चाहे वो रूस से अफ़ग़ानियों का अपना मुल्क आज़ाद कराना हो, सददाम को अपनी राह से हटाने के लिए अमेरिका की इराक़ पर बॉम्बिंग हो, इराक़ सीरिया मे सत्ता के वर्चस्व को लेकर शिया सुन्नी या दूसरे गुटों का संघर्ष हो, यहां तक कि कश्मीर के अलगाववाद को भी इस्लामी चोला पहना दिया गया।
यहां हिन्दू समाज के एक बड़े वर्ग ने फिर नासमझी से काम लिया, दुनिया का इतिहास लड़ाइयों से भरा पड़ा है उन्हे तो सत्ता संघर्ष मान लिया गया लेकिन जिस लड़ाई मे मुसलमान कोई पक्ष था उसे इस्लामी जंग ही माना गया चाहे वो सीमा विवाद ही क्यों न हो ? असल मे इन लड़ाइयो को इस्लामी लड़ाई साबित करके साम्प्रदायिक ताक़तों ने मुसलमान पर जंगी चरित्र थोप दिया और यहीं से इस्लामी आतंकवाद का काल्पनिक हव्वा को सच बना कर पेश किया कि देखो मुसलमान का असली चरित्र यह है इन्हे न रोका गया तो यह यहां भी यही हाल करेंगे ,और यह पैंतरा सफ़ल भी रहा।
3- स्थानीय परिदृश्य मे जो घटनायें घटी और उनमे कोई मुसलमान शामिल था तो उसके लिए मुसलमानों को सामूहिक रूप से ज़िम्मेदार ठहराया गया, मसलन किसी मुस्लिम लड़के ने लड़की छेड़ी या किसी हिन्दू लड़की से प्रेम विवाह किया तो उसे लव जिहाद जैसै सामूहिक और संगठित अपराध बना कर पूरी मुस्लिम क़ौम पर थोप दिया गया, जहालत, ग़ुरबत और बेरोज़गारी की वजह से मुसलमानों की छोटे और असंगठित अपराधो मे संख्या बढ़ती चली गयी इन अपराधों को भी मुसलमानों का सामूहिक चरित्र बना कर पेश किया गया, यानी साम्प्रदायिक ताक़तें, मुसलमानों को देश दुनिया का विलेन बनाने मे कामयाब हो गयीं और मनचाही कामयाबी भी हासिल कर ली, आज बहुसंख्यको की नज़र मे हर मुसलमान या तो आतंकवादी है या आतंकवादियो का समर्थक हैं।
नदीम अख़्तर (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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